सावन, जिसे श्रावण माह के नाम से भी जाना जाता है. जो हिंदू कैलेंडर का सबसे महत्वपूर्ण महीना है. इस दौरान भक्त भगवान शिव की पूजा आराधना करते है. श्रावण माह हिंदुओं, विशेषकर शिव भक्तों के लिए बहुत महत्व रखता है. ऐसी मान्यता है कि यह वह पावन महीना है जब देवों के देव महादेव धरती पर अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए आते हैं.
राजस्थान में ऐसे कई दिव्य मंदिर हैं, जिनकी महिमा का जितना गुणगान किया जाए उतना कम है. जी हां ऐसा ही एक प्राचीन शिव मंदिर चूरू के दुधवाखारा गांव में स्थित है, जहां भोले के अभिषेक के लिए इंग्लैंड से इत्र लाया गया था. इस इत्र की महक से ना सिर्फ दूधवाखारा गांव बल्कि आस पास के गांव भी महक उठे थे. गांव के ही देवेंद्र दाधीच बताते हैं कि जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर 70 साल पहले इस मंदिर को सेठ हजारीमल की पत्नी सरस्वती देवी और उनके दत्तक पुत्र ने बनवाया था. इसकी बनावट हूबहू ताजमहल से मिलती है.
उम्दा कारीगरी का बेहतरीन नमूना
शिव मंदिर में विशेष तौर पर सावन माह में महीने भर धार्मिक आयोजन होते हैं. खास, बात यह है कि पूरी इमारत संगमरमर के पत्थरों से बनाई गई है और उम्दा कारीगरी का ये एक बेहतरीन नमूना है. ग्रामीण देवेंद्र दाधीच बताते हैं कि सरस्वती देवी ने इमारत को बनाने के लिए राजस्थान के बेहतरीन कारीगरों को बुलाया था. इसका नायाब नमूना भी इसके निर्माण में देखने को मिलता है. कारीगरों ने इस इमारत में पत्थरों को जोड़ने के लिए कहीं भी बजरी या सीमेंट काम में नहीं लिया गया है. आने वाले यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसलिए उसके पास में ही धर्मशाला बनाई गई है.
इंग्लैंड से आया इत्र
मंदिर में शिव की स्थापना के दौरान भगवान भोले का इत्र से अभिषेक किया गया जो इत्र इंग्लैंड से मंगवाया गया था. अभिषेक के दौरान इत्र यहां की नालियों में बह गया, इसे ग्रामीण बोतलों में भर कर ले गए और इत्र की ख़ुशबू आस-पास के गांवो तक फैली और तब से ही सावन माह में विशेष पूजा के लिए यहां दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं
Hindustan Times Latest & Breaking News Updates In Hindi