नई दिल्ली
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक के लिए सरकार लोकसभा में दो तिहाई बहुमत हासिल करती दिख रही है. इस कड़ी में नया नाम डीएमके का जुड़ता दिख रहा है. लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं. पिछली बार डीएमके ने इन विधेयकों का कड़ा विरोध किया था और उसके नेता तथा तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से विधेयकों की प्रति जलाई थी. लेकिन बीते तीन-चार महीनों में गंगा-गोदावरी में काफी पानी बह चुका है. तमिलनाडु में डीएमके सत्ता से बाहर हो गई है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी भी सत्ता से बाहर होकर दो फाड़ हो चुकी है. उसका एक बड़ा धड़ा एनडीए के साथ आ चुका है. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना-यूबीटी बुरी तरह टूट चुकी है. शरद पवार की एनसीपी-एसपी सरकार के साथ डील करने में लगी है. ऐसे में लोकसभा में भाजपा के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करना अब लगभग तय लग रहा है. सूत्रों का दावा है कि एनडीए के रणनीतिकार विपक्ष में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को छोड़कर लगभग सभी दलों के साथ संपर्क में हैं. इन सभी गैर कांग्रेस- गैर सपा दलों को साधने के लिए सरकार ने भी कुछ मुद्दों पर नरम रुख अपनाया है।
दरअसल, सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपने सहयोगियों को साथ रखना नहीं थी, बल्कि ऐसे विपक्षी दलों को भी भरोसा दिलाना था जिन्हें परिसीमन के बाद अपने राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आने का डर है. दक्षिण भारत के राज्यों की सबसे बड़ी चिंता यही रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद परिसीमन के बाद उनकी लोकसभा सीटों का अनुपात घट सकता है।
डीएमके के रुख में बदलाव
यहीं से डीएमके के रुख में बदलाव के संकेत दिखाई देते हैं. पार्टी ने पहली बार साफ कहा है कि यदि केंद्र सरकार तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों के हितों की ठोस और लिखित गारंटी देती है तो बातचीत का रास्ता खुल सकता है. डीएमके का कहना है कि सरकार पहले यह स्पष्ट करे कि परिसीमन के बाद किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी. यदि दक्षिणी राज्यों का हिस्सा कम नहीं होता है तो पार्टी अपने पुराने रुख पर पुनर्विचार कर सकती है. यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ माह पहले तक इसी डीएमके ने परिसीमन और महिला आरक्षण को एक साथ लागू करने के प्रस्ताव का सबसे मुखर विरोध किया था. अब उसके तेवर पहले जैसे नहीं दिख रहे हैं।
सरकार ने चली बड़ी चाल
उधर, सरकार ने भी समानांतर तौर पर एक ऐसा कदम उठाया है जिसे छोटे दलों को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को 30 दिन से अधिक की न्यायिक हिरासत में रहने पर पद से हटाने वाले विवादित संविधान संशोधन विधेयक को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया गया है. संसद की संयुक्त समिति ने भी इस पर और व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत बताई है. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार मानसून सत्र में इस विधेयक को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है।
इस फैसले का राजनीतिक संदेश साफ माना जा रहा है. विपक्ष के कई क्षेत्रीय दलों को आशंका थी कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों की सरकारें गिराने के लिए किया जा सकता है. जब सरकार ने फिलहाल इस विधेयक से दूरी बनाई तो उन दलों के लिए महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे दूसरे संविधान संशोधन विधेयकों पर सकारात्मक रुख अपनाने की गुंजाइश बढ़ गई।
एनडीए का संभावित कुनबा
एनडीए (आधिकारिक) │ 293 │
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│ डीएमके (संभावित समर्थन) │ +22 │
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│ टीएमसी के एनडीए समर्थक सांसद │ +20 │
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│ शिवसेना (उद्धव) से आए सांसद │ +6 │
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│ एनसीपी (शरद पवार) (संभावित) │ +8 │
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│ कुल संभावित समर्थन │ 349 │
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कांग्रेस और सपा को छोड़ सभी दलों से संपर्क
रिपोर्ट के मुताबकि एनडीए के रणनीतिकार कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रीय दलों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं. डीएमके के अलावा राजद, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी और कुछ अन्य दलों से भी बातचीत हो सकती है. हालांकि इनमें से किसी दल ने अभी सार्वजनिक रूप से समर्थन का ऐलान नहीं किया है, लेकिन सरकार को उम्मीद है कि सदन में विरोध पहले जितना मजबूत नहीं रहेगा. इन दलों से सांसद वोटिंग से दूर रहकर भी एक तरह स विधेयक का समर्थन कर सकते हैं।
लोकसभा के मौजूदा आंकड़ें
लोकसभा के मौजूदा आंकड़े भी सरकार के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं. एनडीए के पास अपने दम पर लगभग 293 सांसद हैं. यदि डीएमके के 22 सांसद समर्थन देते हैं तो यह संख्या 315 तक पहुंच जाएगी. टीएमसी के एनडीए समर्थक धड़ों की संख्या 20 है. शिवसेना उद्धव गुट से बगावत कर शिवसेना में छह सांसद शामिल हुए हैं. यानी और 26 सांसद सरकार के साथ हैं. अगर शरद पवार की एनसीपी-एसपी के आठ सांसद भी सरकार के साथ आते हैं तो यह आंकड़ा 34 का होगा. इस तरह एनडीए का कुल कुनबा 349 तक पहुंच जाता है. मौजूदा स्थिति में अगर लोकसभा के सभी 543 सदस्य सदन में मौजूद रहते हैं तो दो-तिहाई के लिए 363 सांसदों की जरूरत पड़ेगी. अगर कुछ सांसद वोटिंग में भाग नहीं लेते हैं तो दो-तिहाई के जरूरी संख्या बल घट जाएगा. नियम यह है कि वोटिंग में हिस्सा लेने वाले सांसदों में से दो-तिहाई अगर किसी संविधान संशोधन विधेयक के समर्थन में वोट करते हैं तो उस विधेयक को पास माना जाएगा।
लोकसभा में छोटे दलों की स्थिति
राजद (RJD) │ 4 │
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│ माकपा (CPI-M) │ 4 │
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│ इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) │ 3 │
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│ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) │ 3 │
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│ भाकपा (CPI) │ 2 │
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│ भाकपा (माले) लिबरेशन │ 2 │
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│ नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) │ 2 │
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│ वीसीके (VCK) │ 2 │
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│ भारत आदिवासी पार्टी (BAP) │ 1 │
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│ कुल सांसद │ 23 │
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अब इन छोटे दलों का साधने की कोशिश
इंडिया गठबंधन में कांग्रेस और सपा को छोड़ दें तो… राजद के पास 4, माकपा के पास 4, मुस्लिम लीग के पास 3, झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास 3, भाकपा के पास 2, भाकपा-माले के पास 2, नेशनल कांफ्रेस के पास 2, वीसीके के पास 2 और भारत आदिवासी पार्टी के पास 1 सांसद हैं. यानी ये करीब 23 लोकसभा सांसद ऐसे हैं जो वोटिंग के दौरान अहम रोल निभा सकते हैं. सरकार इनको साधने की कोशिश कर रही है. इनके वोटिंग से दूर रहने भर से भी सरकार की राह एकदम आसान हो जाएगी।
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