मॉस्को
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया फैसलों ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर वॉशिंगटन की नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ ट्रंप रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूसी डीजल के निर्यात को अनुमति देने, रूस पर कुछ प्रतिबंधों में छूट देने और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की आलोचना करने से दोनों सहयोगियों के बीच तनाव बढ़ा है. इन घटनाओं से ऐसा संकेत मिलता है कि ट्रंप अब युद्ध को लेकर जेलेंस्की की रणनीति का समर्थन करने के बजाय उन पर समझौते के लिए दबाव बना रहे हैं।
हालांकि यह कहना कि अमेरिका पूरी तरह यूक्रेन के खिलाफ हो गया है, ये नहीं कहा जा सकता है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के सामने फिलहाल चुनौती उनके देश में होने वाले मिड टर्म इलेक्शन और दबाव से बाहर निकलना है. यही वजह है कि उन्होंने इस वक्त अपना ध्यान यूक्रेन के मसले से हटाकर चुनाव पर टिका रखा है. ये स्थिति जेलेंस्की के लिए सबसे ज्यादा असहज हो गई है. वे खुलकर ट्रंप के खिलाफ बोल रहे हैं और अपना भरोसा यूरोपियन यूनियन पर जता रहे हैं।
90 मिनट की फोन कॉल के बाद क्या बदला?
9 अक्टूबर, 2026 को पुतिन के साथ फोन पर बातचीत के बाद ट्रंप ने रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ाने वाले समझौते की घोषणा की. इसके तहत रूस को अमेरिकी और वैश्विक बाजारों में पहले 3 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा डीजल भेजना था. इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति का प्रस्ताव रखा गया. इस समझौते के साथ रूसी ईंधन पर कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों में भी राहत दी गई. 16 अक्टूबर को जारी कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने ग्राहम कानून के कई प्रावधानों से छूट देने के लिए राष्ट्रीय हित का हवाला दिया. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे ईंधन की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. अब यूक्रेन के लिए समस्या ये है कि रूस को तेल उत्पाद बेचने का मौका मिलने से उसकी कमाई बढ़ सकती है. इसी धन का इस्तेमाल युद्ध जारी रखने के लिए किया जा सकता है. जेलेंस्की ने इस फैसले को अनुचित बताते हुए चेतावनी दी है कि डीजल के बाद रूस के साथ गैस और दूसरे क्षेत्रों में भी व्यापारिक समझौते हो सकते हैं. उनके मुताबिक इससे प्रतिबंधों में व्यापक ढील का रास्ता खुल सकता है।
भारत-चीन का क्या फायदा?
अब ट्रंप के लिए मिड टर्म इलेक्शन गले की हड्डी बना हुआ है, जिसे लेकर उन्हें अपने देश में दबाव का सामना करना पड़ रहा है. इसे खत्म करने के लिए ट्रंप डीजल की आपूर्ति बढ़ाने वाला समझौता किया है. इस परिस्थिति में रूस से तेल खरीदने वाले टॉप सप्लायर्स पर अभी वो 100 फीसदी टैरिफ वाली तलवार टल गई है, जो मुसीबत साबित होने वाली थी. रूस से तेल लेने वाले देशों चीन-भारत सबसे ऊपर हैं, ऐसे में रूस को प्रतिबंधों और टैरिफ में राहत मिलने का सीधा मतलब ये है कि भारत-चीन को आंशिक तौर पर फायदा होगा।
जेलेंस्की पर नाराजगी की वजह क्या है?
ट्रंप और जेलेंस्की के बीच मतभेद केवल रूसी ईंधन तक सीमित नहीं हैं. अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने की दिशा में कदम उठाए, क्योंकि इन हमलों से रूस की ईंधन आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें बढ़ सकती हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यूक्रेन के हमले जारी रहने के बाद ट्रंप ने रूस के साथ डीजल समझौता किया. वहीं दूसरी तरफ जेलेंस्की का आरोप है कि यूक्रेन ने अमेरिकी आग्रह पर ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की कोशिश की, लेकिन रूस ने यूक्रेन के ऊर्जा ढांचे पर हमले जारी रखे।
इसी वजह से उन्होंने रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले दोबारा शुरू करने की घोषणा की. यह टकराव दिखाता है कि दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने की शर्तों पर सहमति नहीं बन पा रही है।
ट्रंप ने यह भी कहा है कि पुतिन, जेलेंस्की के मुकाबले शांति समझौता करने के लिए अधिक इच्छुक दिखाई देते हैं. इस बयान से यूक्रेन की चिंता बढ़ी है, क्योंकि इससे युद्ध के लिए रूस के बजाय यूक्रेन को जिम्मेदार ठहराने का राजनीतिक दबाव बन सकता है.
स्टारलिंक के लिमिटेड एक्सेस से उठे सवाल
जेलेंस्की ने यूरोपीय नेताओं के सामने अमेरिकी स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा पर लगी गति संबंधी पाबंदियों का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि इन सीमाओं से यूक्रेन की एंटी ड्रोन एक्टिविटी और सैन्य रसद पर असर पड़ा. युद्ध में अमेरिकी तकनीक और सहायता पर यूक्रेन की निर्भरता उसे मुश्किल स्थिति में डालती है. ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन के दौरान जेलेंस्की ने 2027 के लिए कम से कम 70 अरब यूरो की अतिरिक्त सहायता मांगी. उनका कहना था कि यूक्रेन को रक्षा, हथियारों और देश की मजबूती बनाए रखने के लिए इस धन की जरूरत होगी. यह मांग बताती है कि कीव अब यूरोप से ज्यादा आर्थिक और सैन्य समर्थन हासिल करना चाहता है।
क्यों जेलेंस्की के पीछे ही पड़ गए ट्रंप?
ट्रंप के फैसलों के पीछे तीन संभावित कारण दिखाई देते हैं –
अमेरिका में ईंधन की कीमतों को कम करके घरेलू आर्थिक दबाव घटाना.
रूस के साथ सीधे समझौते के जरिए युद्ध समाप्त करने की कोशिश करना.
यूक्रेन पर ऐसी शर्तें स्वीकार करने का दबाव बनाना, जिन्हें अमेरिका शांति वार्ता के लिए जरूरी मानता है।
अगर इसका दूसरा पहलू देखें, तो रूस को आर्थिक राहत मिलने से पुतिन की स्थिति मजबूत हो सकती है, जबकि यूक्रेन की बातचीत करने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है. अमेरिकी नीति पर आलोचना करने वाले सांसदों ने भी चेतावनी दी है कि रूसी ईंधन की बिक्री से मॉस्को को युद्ध के लिए अतिरिक्त संसाधन मिल सकते हैं. फिलहाल उपलब्ध घटनाक्रम यह संकेत देता है कि ट्रंप की प्राथमिकता यूक्रेन को बिना शर्त समर्थन देने के बजाय अमेरिकी आर्थिक हितों और रूस के साथ संभावित समझौते को आगे बढ़ाना है. इससे जेलेंस्की पर दबाव बढ़ रहा है और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं।
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